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Supreme Court on EWS Quota: निजी स्कूलों में 25% RTE सीटों पर NCPCR को फटकार, चेयरपर्सन-डायरेक्टर को बुलाया

सुप्रीम कोर्ट ने निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कमजोर वर्ग और वंचित समूह के बच्चों के लिए 25% प्रवेश प्रावधान लागू कराने के तरीके को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की भूमिका पर कड़ी नाराजगी जताई है। 29 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि NCPCR का काम केवल राज्यों से जानकारी इकट्ठा करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि RTE Act की धारा 12(1)(c) का उद्देश्य वास्तविक रूप से लागू हो।

अदालत ने NCPCR के चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2026 के उस फैसले की निगरानी से जुड़ा है, जिसमें 25% RTE प्रवेश व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बाध्यकारी नियम बनाने पर जोर दिया गया था।

25% RTE कोटा आखिर किसके लिए है?

यहां एक जरूरी कानूनी अंतर समझना महत्वपूर्ण है। आम बोलचाल में इसे अक्सर EWS कोटा कहा जाता है, लेकिन RTE Act की धारा 12(1)(c) केवल EWS तक सीमित नहीं है। यह निजी गैर-सहायता प्राप्त और संबंधित निर्दिष्ट श्रेणी के स्कूलों में प्रवेश स्तर पर कम से कम 25% सीटें “weaker sections” और “disadvantaged groups” के बच्चों के लिए रखने का प्रावधान करती है।

इन बच्चों को प्राथमिक/प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक कानून के अनुसार मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रावधान है। RTE व्यवस्था में इसके लिए राज्य सरकारों और संबंधित प्राधिकरणों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

सुप्रीम कोर्ट को NCPCR के काम करने के तरीके पर आपत्ति क्यों हुई?

29 सितंबर की सुनवाई में अदालत NCPCR की उस भूमिका से संतुष्ट नहीं दिखी जिसमें राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 25% RTE प्रावधान लागू करने के लिए बनाए गए नियमों की जानकारी एकत्र की जा रही थी।

Bar & Bench के अनुसार, पीठ ने सवाल उठाया कि NCPCR केवल जानकारी “collate” करने तक सीमित नहीं रह सकता। अदालत ने कहा कि आयोग को यह देखना होगा कि हर neighbourhood school में धारा 12 का उद्देश्य वास्तविक रूप से लागू हो।

अदालत की टिप्पणी का सार यह था कि NCPCR एक वैधानिक संस्था है और उसके पास इस व्यवस्था को जमीन पर लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी वजह से पीठ ने आयोग के चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में उपस्थित रहने को कहा।

जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि Dinesh Biwaji Ashtikar vs State of Maharashtra मामले में 13 जनवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ी है।

उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि neighbourhood schools में कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25% प्रवेश का प्रावधान केवल कागज पर मौजूद अधिकार नहीं रहना चाहिए। कोर्ट ने इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रवेश प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने पर जोर दिया।

कोर्ट ने यह भी माना कि NCPCR द्वारा तैयार Standard Operating Procedure (SOP) अपने आप में बाध्यकारी कानून या नियम नहीं है। इसलिए राज्यों और संबंधित सरकारों को RTE Act की धारा 38 के तहत आवश्यक नियम और विनियम तैयार करने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने किन चरणों पर जोर दिया था?

जनवरी के फैसले में प्रवेश प्रक्रिया को मोटे तौर पर तीन चरणों में व्यवस्थित करने की बात सामने आई थी:

  • सीटों का निर्धारण और उपलब्ध सीटों की जानकारी
  • आवेदन, जांच, चयन और प्रवेश की पारदर्शी प्रक्रिया
  • प्रवेश के बाद निगरानी, शिकायत निवारण और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया

कोर्ट ने ऑनलाइन सिस्टम, सहायता केंद्र, आवेदन में त्रुटि सुधार का अवसर, विवाद समाधान और reimbursement जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत पर भी चर्चा की थी।

NCPCR को सिर्फ रिपोर्ट तैयार करने से आगे क्यों जाना होगा?

जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से यह जानकारी जुटाने का निर्देश दिया था कि 25% RTE प्रवेश को लागू करने के लिए आवश्यक नियम बनाए गए हैं या नहीं।

लेकिन मौजूदा सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि सिर्फ राज्यों से जवाब लेना और आंकड़े एकत्र करना अंतिम उद्देश्य नहीं है। अदालत चाहती है कि कानून में दिए गए अधिकार का वास्तविक लाभ पात्र बच्चों तक पहुंचे।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत की निगरानी में यह भी सामने आया कि नौ राज्य और केंद्रशासित प्रदेश इस संबंध में मांगी गई जानकारी पर अभी जवाब नहीं दे पाए थे, जबकि अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं।

बच्चों और अभिभावकों के लिए इसका क्या मतलब है?

इस मामले का महत्व केवल सरकारी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। RTE Act की धारा 12(1)(c) का सीधा संबंध उन बच्चों के प्रवेश से है जिन्हें निजी स्कूलों में शिक्षा पाने के लिए इस कानूनी व्यवस्था का सहारा मिलता है।

सरकारी दिशा-निर्देशों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से पारदर्शी और user-friendly admission system, सहायता केंद्र तथा शिकायत निवारण व्यवस्था विकसित करने की अपेक्षा की गई है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा निगरानी का अगला महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि राज्यों में नियम कितने स्पष्ट हैं, आवेदन और चयन की प्रक्रिया कितनी सुलभ है और पात्र बच्चों को प्रवेश से जुड़े विवादों में प्रभावी शिकायत निवारण मिलता है या नहीं।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR को अवमानना के मामले में बुलाया है?

नहीं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह contempt proceeding नहीं है। चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का निर्देश इसलिए दिया गया है ताकि आयोग अपनी भूमिका और जनवरी के फैसले के अनुपालन की स्थिति पर अदालत के सामने जवाब दे सके।

इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को NCPCR के खिलाफ किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। अभी अदालत की निगरानी और अनुपालन की प्रक्रिया जारी है।

अब अगली सुनवाई में किस बात पर नजर रहेगी?

अगली सुनवाई में NCPCR के शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी महत्वपूर्ण होगी। अदालत यह जानना चाहती है कि जनवरी के फैसले के बाद 25% RTE प्रवेश व्यवस्था को लागू कराने के लिए आयोग और राज्यों ने क्या ठोस कदम उठाए हैं।

साथ ही यह भी महत्वपूर्ण रहेगा कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में धारा 12(1)(c) के लिए आवश्यक बाध्यकारी नियम किस स्थिति में हैं। सुप्रीम कोर्ट का जनवरी का फैसला पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि केवल गैर-बाध्यकारी SOP पर्याप्त नहीं होंगे।

Key Facts

  • सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को NCPCR की 25% RTE प्रवेश व्यवस्था की निगरानी को लेकर सवाल उठाए।
  • मामला RTE Act की धारा 12(1)(c) के तहत निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कम से कम 25% प्रवेश से जुड़ा है।
  • यह प्रावधान कमजोर वर्ग और disadvantaged groups के बच्चों पर लागू होता है; इसे केवल EWS तक सीमित करना तकनीकी रूप से सही नहीं है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने NCPCR के चेयरपर्सन और डायरेक्टर को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने को कहा है।
  • जनवरी 2026 में कोर्ट ने राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को धारा 38 के तहत आवश्यक नियम बनाने का निर्देश दिया था।
  • कोर्ट ने कहा था कि NCPCR की SOP बाध्यकारी नियमों का विकल्प नहीं है।
  • मौजूदा कार्यवाही में अंतिम अनुपालन स्थिति अभी अदालत की निगरानी में है।

निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सख्ती का केंद्र 25% RTE प्रवेश प्रावधान को केवल सरकारी रिकॉर्ड या रिपोर्टिंग तक सीमित रखने के बजाय उसे स्कूल स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू कराना है। NCPCR अब अगली सुनवाई में यह स्पष्ट करेगा कि जनवरी के फैसले के बाद राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में नियम बनाने तथा पात्र बच्चों को प्रवेश दिलाने की दिशा में क्या ठोस प्रगति हुई है।

Source: Supreme Court of India — Dinesh Biwaji Ashtikar judgment, 13 January 2026
What it supports: 25% RTE admission mandate, NCPCR’s role, SOP की गैर-बाध्यकारी प्रकृति और राज्यों को नियम बनाने के निर्देश।

Source: India Code — Right to Education Act, 2009
What it supports: RTE Act की धारा 12 सहित अधिनियम की आधिकारिक संरचना।

Source: Government of India — RTE implementation guidelines
What it supports: 25% प्रवेश, transparent admission system, help desks और grievance-redressal से जुड़ी सरकारी दिशानिर्देश व्यवस्था।

Source: Bar & Bench — Supreme Court pulls up NCPCR over RTE quota implementation
What it supports: 29 सितंबर 2026 की सुनवाई, अदालत की टिप्पणियां और NCPCR चेयरपर्सन/डायरेक्टर को अगली सुनवाई में उपस्थित होने का निर्देश।

Source: Hindustan Times — SC pulls up NCPCR for 25% EWS quota implementation
What it supports: मौजूदा अनुपालन स्थिति और अदालत की NCPCR के approach पर नाराजगी।

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