गुजरात सरकार उपजाऊ कृषि भूमि पर सोलर पैनल लगाने को नियंत्रित करने के लिए नई नीति लाने पर विचार कर रही है। द टाइम्स ऑफ इंडिया की 20 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के कृषि विभाग के एक अध्ययन में मध्य गुजरात के चारोतार क्षेत्र में किसानों द्वारा उपजाऊ जमीन सौर ऊर्जा कंपनियों को लंबे समय के लिए किराये पर देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई है। संभावित नीति का मकसद खेती की उत्पादकता और सौर ऊर्जा के विस्तार के बीच संतुलन बनाना है।
सोलर कंपनियों को जमीन किराये पर देना किसानों के लिए क्यों आकर्षक है?
रिपोर्ट के अनुसार, आनंद और वडोदरा जिलों में कुछ किसान अपनी उपजाऊ जमीन सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए लीज पर दे रहे हैं। इस क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था और कई फसलें उगाने की परंपरा इसे कृषि के लिहाज से अहम बनाती है।
रिपोर्ट में बताए गए लीज समझौतों के मुताबिक, सौर ऊर्जा डेवलपर प्रति एकड़ सालाना लगभग ₹60,000 से ₹65,000 किराया देने की पेशकश कर सकते हैं। कुछ अनुबंधों में 30 साल की अवधि और हर साल 5% किराया बढ़ाने का प्रावधान बताया गया है। कुछ व्यवस्थाओं में जमीन मालिकों को सोलर साइट पर निगरानी का काम देकर ₹12,000 मासिक वेतन देने की बात भी सामने आई है। ये शर्तें रिपोर्ट में बताए गए समझौतों से संबंधित हैं; इन्हें गुजरात के सभी प्रोजेक्टों पर लागू नहीं माना जाना चाहिए।
खेती की लागत बढ़ने, फसल की उपज में अनिश्चितता और मौसम से होने वाले नुकसान के बीच निश्चित किराये की आय कुछ किसानों को आकर्षित कर सकती है। लेकिन जमीन लंबे समय तक सौर परियोजना के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो खेती के लिए उपलब्ध भूमि पर उसका क्या असर पड़ेगा—यही नीति से जुड़ा प्रमुख सवाल है।
कृषि विभाग की चिंता: असर सिर्फ जमीन तक सीमित रह सकता है
द टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, कृषि विभाग के अध्ययन में आशंका जताई गई है कि उपजाऊ जमीन को लंबे समय तक खेती से अलग रखने पर खाद्यान्न उत्पादन और पशुओं के चारे की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। अध्ययन में अल्पकाल और 10 से 30 साल की लंबी अवधि के संभावित प्रभावों पर चर्चा की गई है।
यह अध्ययन की आशंका और अनुमान हैं, न कि गुजरात में खाद्यान्न उत्पादन या मिट्टी की उर्वरता में हुए किसी निश्चित नुकसान के प्रमाण। वास्तविक असर जमीन की गुणवत्ता, परियोजना के डिजाइन, खेती की निरंतरता और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
खेती से निकलने वाले फसल अवशेष पशुओं के चारे के काम भी आते हैं। इसलिए यदि किसी क्षेत्र में खेती का रकबा लगातार घटता है, तो इसका असर कृषि से जुड़े दूसरे कामों और डेयरी आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट में अध्ययन ने इसी तरह की संभावित कड़ियों की ओर ध्यान दिलाया है।
क्या सौर ऊर्जा और खेती एक ही जमीन पर साथ चल सकती हैं?
सौर पैनल लगाने का अर्थ हर स्थिति में खेती पूरी तरह बंद करना नहीं है। एग्रीवोल्टाइक्स (AgriPV) नाम की व्यवस्था में पैनल ऊंचे ढांचों पर लगाए जाते हैं, ताकि उनके नीचे या आसपास खेती जारी रखी जा सके।
द इंडियन एक्सप्रेस की 19 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार कृषि और सौर ऊर्जा के संयुक्त इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन पर विचार कर रही है। रिपोर्ट में नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी के हवाले से बताया गया कि ऐसे प्रोजेक्ट पारंपरिक जमीन पर लगाए जाने वाले सोलर प्लांट से लगभग 25–30% महंगे हो सकते हैं, क्योंकि इनके लिए ऊंचे ढांचे और अतिरिक्त निर्माण की जरूरत होती है।
यह केंद्र स्तर पर विचाराधीन पहल है; इसे गुजरात की प्रस्तावित नीति का अंतिम स्वरूप नहीं समझना चाहिए। फिर भी, इससे यह स्पष्ट होता है कि सौर ऊर्जा विस्तार और कृषि भूमि की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए केवल जमीन पर पैनल लगाने की अनुमति या रोक ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
गुजरात की मौजूदा नवीकरणीय ऊर्जा नीति में क्या है?
गुजरात की 2025 की एकीकृत नवीकरणीय ऊर्जा नीति में एग्रीवोल्टाइक्स और भूमि के दोहरे उपयोग वाले मॉडलों को समर्थन देने का उल्लेख है। नीति में निजी जमीन या सरकार द्वारा आवंटित बंजर भूमि पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की व्यवस्था भी शामिल है।
इसलिए उपजाऊ जमीन पर सोलर पैनल को नियंत्रित करने के प्रस्ताव और पहले से मौजूद नवीकरणीय ऊर्जा नीति के प्रावधानों को अलग-अलग समझना जरूरी है। ताजा मीडिया रिपोर्ट में नई नीति पर विचार की बात कही गई है, लेकिन इस रिपोर्ट के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि नई रोक या अंतिम नियम अधिसूचित हो चुके हैं।
नई नीति में किन बातों पर नजर रहेगी?
आगे सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि सरकार उपजाऊ कृषि भूमि की पहचान कैसे करेगी और किन परिस्थितियों में सोलर परियोजनाओं की अनुमति दी जाएगी। नीति का अंतिम स्वरूप सामने आने पर इन पहलुओं पर ध्यान देना होगा:
- उपजाऊ कृषि भूमि और कम उपजाऊ या बंजर जमीन के बीच अंतर तय करने के मानदंड।
- पहले से चल रही सौर परियोजनाओं और मौजूदा लीज समझौतों पर संभावित नियमों का असर।
- जमीन मालिकों की आय और खेती जारी रखने के विकल्पों के बीच संतुलन।
- एग्रीवोल्टाइक्स जैसे ऐसे मॉडल, जिनमें एक ही जमीन पर खेती और बिजली उत्पादन संभव हो।
फिलहाल क्या पुष्टि है? 20 अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्ट में गुजरात सरकार द्वारा नीति पर विचार किए जाने की जानकारी है। नई नीति के अंतिम नियम, लागू होने की तारीख और मौजूदा परियोजनाओं पर उसके प्रभाव की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट से नहीं होती। सरकार की औपचारिक अधिसूचना या विस्तृत बयान आने तक इन बिंदुओं को खुला समझना चाहिए।
Sources
Source 1: The Times of India
- Link: Gujarat government considers policy on solar panels over fertile land
- What it supports: गुजरात सरकार के प्रस्ताव पर विचार, चारोतार क्षेत्र में जमीन लीज पर देने की प्रवृत्ति और कृषि विभाग के अध्ययन में उठाई गई चिंताएं।
Source 2: The Indian Express
- Link: Centre considers incentives for elevated solar panels above farms
- What it supports: एग्रीवोल्टाइक्स का मॉडल, केंद्र सरकार की विचाराधीन प्रोत्साहन योजना और ऊंचे ढांचों पर पैनल लगाने की अतिरिक्त लागत।
Source 3: Gujarat Integrated Renewable Energy Policy 2025
- Link: उपलब्ध नीति दस्तावेज़
- What it supports: एग्रीवोल्टाइक्स, भूमि के दोहरे उपयोग और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े मौजूदा नीति प्रावधान। यह नीति दस्तावेज़ की तृतीय-पक्ष होस्टिंग है; प्रकाशन से पहले आधिकारिक सरकारी प्रति से मिलान करना बेहतर होगा।


